गठबंधन की मजबूरी क्या? By अजित द्विवेदी What is the compulsion of the alliance? By Ajit Dwivedi



देश की राजनीति अभूतपूर्व, ऐतिहासिक दौर से गुजर रही है। सब कुछ असामान्य सा हो गया है। देश के सामने भयंकर आर्थिक संकट के लक्षण दिख रहे हैं- व्यापार संतुलन बिगड़ा है, पेट्रोल व डीजल की कीमत लगातार बढ़ रही है, चालू खाते का घाटा बढ़ रहा है, अगले महीने फिर रिजर्व बैंक के नीतिगत ब्याज दरों में बढ़ोतरी का संकेत है, रुपए की कीमत पिछले दो महीने में साढ़े 12 फीसदी से ज्यादा गिर चुकी है और उभरते बाजारों से आने वाले निवेशकों ने भारत से मुंह मोड़ लिया है। 

जितना बड़ा आर्थिक संकट है उसी अनुपात का सामाजिक संकट देश के सामने है। पूरा हिंदू समाज भयंकर जातीय विभाजन का शिकार है- एससी, एसटी उत्पीड़न रोकथाम कानून पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलटने के लिए सरकार के कानून बनाने के बाद हालात और बिगड़े हैं। निहित स्वार्थ के तहत देश के दो सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदायों – मुस्लिम और ईसाई को हिंदुओं के मुकाबले खड़ा किया जा रहा है। आए दिन दोनों बड़े अल्पसंख्यक समुदायों को किसी न किसी बहाने कठघरे में खड़ा किया जा रहा है। 

देश के सामने मौजूद आर्थिक और सामाजिक संकट के अनुपात में ही राजनीतिक संकट भी है। कई कारणों से देश की राजनीति सामान्य नहीं रह गई है। मीडिया और सोशल मीडिया का इस्तेमाल करके, जो जातीय और धार्मिक संकट खड़ा किया गया है वह प्रत्यक्ष रूप से राजनीति से जुड़ा है। तभी असामान्य परिस्थितियों में असामान्य उपाय करने की जरूरत पार्टियों को दिख रही है। 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद बिहार में भाजपा को जो ऐतिहासिक जीत मिली, उसने ऐसी परिस्थितियां पैदा कर दीं कि राष्ट्रीय जनता दल के विरोध में बने जनता दल यू को उसके साथ तालमेल करना पड़ा। इस गठबंधन ने बिहार में भाजपा और नरेंद्र मोदी का विजय रथ रोक दिया।

अब बिहार जैसी असामान्य परिस्थिति देश के लगभग हर राज्य में दिख रही है। तभी बिहार जैसे गठबंधन की मजबूरी पूरे देश में बन गई है। उत्तर प्रदेश में दो धुर विरोधी और चिर प्रतिद्वंद्वी पार्टियां सपा और बसपा एक साथ आ रही हैं। गौरतलब है कि दोनों पार्टियां जाति के वोट बैंक पर आधारित हैं और दोनों के कोर वोट बैंक के बीच जमीनी स्तर पर संघर्ष का इतिहास रहा है। 

ऐसे ही कांग्रेस के विरोध में बनी तेलुगू देशम पार्टी के बीच तेलंगाना में तालमेल हो रहा है और हैरानी नहीं होगी अगर आंध्र प्रदेश में भी दोनों पार्टियों के बीच तालमेल हो जाए। ध्यान रहे कांग्रेस के विरोध में तेलुगू अस्मिता के नाम पर टीडीपी का गठन हुआ था। वैचारिक रूप से दोनों दो छोर पर खड़ी पार्टियां हैं पर राजनीतिक मजबूरी में दोनों साथ आ रही हैं। इसी तरह लेफ्ट मोर्चे के विरोध में बनी तृणमूल कांग्रेस को वामपंथी पार्टियों के साथ मिलने में आपत्ति नहीं रह गई है। दोनों के बीच चुनावी तालमेल होना या नहीं होना अलग बात है पर वैचारिक दूरी खत्म हुई है। 

सो, सवाल है कि वैचारिक मतभेद खत्म करके, क्षेत्रीय अस्मिता की मजबूरियों को दरकिनार करके और वोट बैंक के जातीय गणित और अपने कोर वोट के बीच के ऐतिहासिक संघर्ष को भूल कर क्यों सारी पार्टियां गठबंधन एक साथ आ रही हैं? क्या सत्ता की गोंद इन पार्टियों को साथ ला रही है या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजनीति ने इन्हें डरा दिया है? इस तरह की राजनीति देश में 1977 में हुई थी। तब सारी पार्टियों ने अपना अस्तित्व मिटा कर जनता पार्टी बनाई थी। इंदिरा गांधी को सत्ता से हटाने से लिए। अटल बिहारी वाजपेयी ने बहुत अच्छे रूपक का इस्तेमाल करते हुए कहा था कि सबने अपनी अपनी नौकाएं जला दीं और जनता पार्टी के जहाज पर सवार हो गए। 

पर तब और अब की गठबंधन राजनीति में एक बुनियादी फर्क है। तब जनता पार्टी की सारी राजनीतिक लोकतंत्र की रक्षा और राजनीतिक व सामाजिक शुचिता के लक्ष्य से निर्देशित हो रही थी। जयप्रकाश नारायण एक नैतिक लाइट हाउस की तरह सबसे आगे खड़े थे। इस बार कोई ऐसी नैतिक शक्ति आगे नहीं खड़ी है। दूसरे, यह हकीकत है कि आज लोकतंत्र के लिए खतरा उस समय के मुकाबले ज्यादा बड़ा है पर जो पार्टियां उसे बचाने के लिए एकजुट हो रही हैं उनकी भी लोकतंत्र में कोई खास आस्था नहीं रही है। 

कांग्रेस ने अपने लंबे राज में कई बार लोकतंत्र के लिए वास्तविक खतरा पैदा किया और हर बार जन प्रतिरोध की वजह से कांग्रेस को पीछे हटना पड़ा। चाहे इंदिरा गांधी की इमरजेंसी हो या राजीव गांधी का मानहानि बिल हो! इस पूरे कुनबे में लेफ्ट को छोड़ दें तो बाकी सारी पार्टियां परिवार आधारित हैं और एक नेता के करिश्मे से बंधी हैं।

जहां तक आर्थिक व सामाजिक संकट से देश को बचाने का सवाल है तो भाजपा गठबंधन के खिलाफ खड़ी हो रही तमाम पार्टियों का रिकार्ड भी बहुत खराब रहा है। सो, यह नहीं कहा जा सकता है कि भाजपा के विरोध में प्रस्तावित गठबंधन लोकतंत्र की रक्षा और देश के सामने मौजूद अभूतपूर्व राजनीति, सामाजिक और आर्थिक संकट की मजबूरियों के कारण बन रहा है। यह सिर्फ और सिर्फ अपने अस्तित्व की रक्षा और सत्ता हासिल करने की चाहना में बन रहा है। इसमें शामिल पार्टियों का कोई सैद्धांतिक सरोकार नहीं है, सिर्फ सत्ता की चाह है और अस्तित्व बचाने की मजबूरी है।  



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