9 साल चले हत्या के मुकदमे में सभी आरोपी बरी All accused acquitted in 9 years of murder case




गाजियाबाद, ( सर्वोदय शांतिदूत ब्यूरो )  थाना कोतवाली पिलखुआ क्षेत्र के मोहल्ला खटीकान में 2 फरवरी 2009 को हुई विकलांग लोकेश की हत्या  के मामले में  चारों आरोपी गाजियाबाद की अपर सत्र न्यायाधीश श्रीमती अनिता राज की अदालत ने साक्ष्यों के अभाव और गवाहों के विरोधाभासी बयानों के आधार पर बरी कर दिये। बचाव पक्ष के वकील कृष्ण गोपाल कुलश्रेष्ठ और ब्रहम प्रकाश  की दलीलों के आगे पुलिस की विवेचना और सरकारी वकील की दलीलें धरी रह गई।
      
 बचाव पक्ष के वकील कृष्ण गोपाल कुलश्रेष्ठ ने बताया कि मोहल्ला खटीकान  पिलखुआ में विकलांग लोकेश की 2 फरबरी 2009 को हत्या हुई थी इस मामले में मृतक के भाई सुरेंद्र कुमार ने हापुड़ के मोहल्ला चंडी निवासी कल्लू पुत्र मुसद्दी, राजकुमार पुत्र रामस्वरूप, बंटी पुत्र श्री निवास तथा सविता पुत्री रामनिवास निवासी गण मोहल्ला खटीकान कस्बा व थाना पिलखुवा को आरोपी बनाया था। आरोप था कि मृतक लोकेश की सरिता पुत्री के समान लगती थी सरिता के कल्लू से नाजायज संबंध थे। मृतक लोकेश ने कल्लू को काफी समझाया था कि सरिता उसकी बेटी के समान है उसके साथ नाजायज संबंध नहीं रखे। इससे उनके परिवार की  बहुत बदनामी होती है। उसके समझाने पर कल्लू नहीं माना और उसने यह बात सरिता को बतायी। यह कल्लू और सबिता को बहुत बुरा लगा। आरोप है कि कल्लू और सरिता ने अपने साथ राजकुमार और बंटी को मिलाकर लोकेश की 2 फरबरी 2009 की रात में 11बजे के करीव ईट से सर कुचलकर हत्या कर दी। रिपोर्ट में वादी सुरेन्द्र ने लिखया था कि उसके विकलांग भाई लोकेश को घटना वाले दिन रात के 8 बजे आरोपी कल्लू व बंटी बुलाकर अपने साथ ले गये थे। जब वह नहीं लौटा तो वह रूपचंद को साथ लेकर लोकेश को तलाशने के लिये निकला तो उसने टार्च की रोशनी में देखा कि आरोपी घासीराम के घेर में लोकेश को ईंटों से मार रहे है जिससे उससे उसका भेजा बाहर निकल गया है और उसकी मौत हो चुकी है।
         
बचाव पक्ष के वकीलों ने गवाहों के बयान और पुलिस  की विवेचना को एक दूसरे के विपरीत बताया और कहानी को मनगढ़ंत करार दे दिया। बचाव पक्ष के वकील ने दलील दी  कि घटना के गवाह और वादी सुरेंद्र कुमार ने अपने बयान में  बताया है कि घटना 2 फरबरी की रात 11-11.30 बजे के करीब की है जबकि रिपोर्ट थाना पिलखुवा में अगले दिन 7.30 बजे लिखाई गई दर्ज है, फिर इतनी देर क्यों हुई। जबकि घटनास्थल और थाने की दूरी महज सौ मीटर है। रिपोर्ट  को लिखने वाला  व्यक्ति संजीव राघव है जिसे वादी ने बताया कि वह उसे पहले से नहीं जानता था। लेकिन संजीव राघव ने अपने बयान में अदालत को बताया कि वह वादी को जानता है और पेशे से अधिवक्ता है। इस पर बचाव पक्ष के वकील ने दलील दी कि जब वादी को पता चला था कि उसके भाई को ईटों से कुचलकर मारा जा रहा है तो वह उसे वह अस्पताल क्यों नहीं ले गया तथा रिपोर्ट लिखाने में विलंब जानबूझकर इसलिये किया गया जिससे वह कानूनी सलाह लेकर अपने बिरोधियों को सबक सिखाये। घटना की रिपोर्ट लिखाने वाले अधिवक्ता ने अपनी  गबाही में अदालत को बताया था कि वह वादी को थाना पिलखुवा में तीन फरबरी को 9.30 बजे सुबह मिला था जब कि थाना पिलखुवा की जीडी में रिपोर्ट लिखाने का समय 7.30 बजे अंकित है। बचाव पक्ष के बकील ने अदालत से कहा कि यह कैसे हो सकता है कि रिपोर्ट लिखाने वाला दो घंटे बाद में मिलता है और उसकी लिखी घटना की रिपोर्ट थाने में पहले ही लिखी जाती है। इसका मतलब साफ है कि यह विरोधियों को फंसाने के लिए षडयंत्र रचा गया था।
         
दूसरी ओर मृतक की मां अत्री ने अदालत को शपथ पत्र देकर बताया कि 2 तारीख में  उसके बेटे लोकेश को शाम 8 बजे घर से कल्लू बंटी और राजकुमार आवाज लगा कर ले गये थे, उस समय में वह तीसरी मंजिल पर खाना बना रही थी। 3 तारीख में उसके पीतसरे के लड़के मंगते ने आवाज मारी कि तेरा लड़का लोकेश  घासीराम के घेर में कैसे पड़ा है? वह घेर में भाग कर गई तो उसने घेर में जाकर देखा कि लोकेश के  सिर  में चोट लगी हुई थी  और लोकेश खत्म हो गया था। उसी समय इस बयान के अतिरिक्त मृतक की मां अत्री ने अपने बयान में अदालत को बताया कि उसका एक बेटा सुरेंद्र है उसकी जान को भी खतरा है। इसी गवाह ने अदालत को यह बताया कि  घटना वाले दिन उसके बेटे  लोकेश ने दूसरे मोहल्ले में होने वाली एक कुआं पूजन की पार्टी में भाग लिया था। वह रात को 8 बजे गया लेकिन  देर रात तक नहीं लौटा था। तो अगले दिन उसे उसके पितसरे के लड़के मंगते से पता चला कि लोकेश घेर में पड़ा है। उसने वहां जाकर देखा लोकेश पड़ा है उसकी खोपड़ी में चोट लगी है और वह मर चुका था। अत्री ने अपने बयान में अदालत को यह भी बताया कि अगले दिन जब उसे उठाया गया तो उसका बेटा सुरेन्द्र उस समय ऊपर कमरे में सो रहा था। उसने बताया कि  उसके बेटे लोकेश को किसी ने मारते हुए नहीं देखा। अत्री के बयान से साफ हो गया कि वादी सुरेंद्र ने भी लोकेश की हत्या करते हुए नहीं देखा। 
           
सुरेंद्र ने  अपनी मुख्य परीक्षा में कहा था कि लोकेश को कल्लू  और सविता के अवैध संबंधों की जानकारी थी । इस कारण से उसने उसकी हत्या की गयी। बचाव पक्ष के वकीलों ने बताया कि घटना के चश्मदीद गवाह कोई और नहीं बल्कि एक वादी और दूसरी उसकी मां थी, दोनों के बयान बिपरीत हैं। वादी ने अदालत को बताया है उसने रात को 11 से 11.30 बजे करीब  पड़ोसी के घेर में चारों आरोपियों को अपने भाई को ईट से सिर कुचलते हुए टॉर्च की रोशनी में ,लेकिन जांच अधिकारी ने  वह टॉर्च अपने कब्जे में क्यों नहीं ली ? शव की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में डॉक्टर ने मौत की वजह सिर में लाठी, डंडे,ईंट और सरिये से चोट पहुंचाना बताया है, जबकि विवेचक ने हत्या में प्रयुक्त एक ईट को बताया है। अदालत में बचाव पक्ष के वकीलों ने स्टेट आफ हिमाचल प्रदेश बनाम दीवाना 1995 और बक्शीष सिंह बनाम स्टेट आफ पंजाब एआईआर1971 आदि मामलों की मिसालें दीं और अपने मुविक्कलों को बाइज्जत रिहा करने की मांग की।
    
सभी पक्षों को सुनने के बाद गांजियाबाद जिला अदालत की अपर सत्र न्यायाधीश श्रीमती अनिता राज की अदालत ने साक्ष्य के अभाव में अभियुक्तगण कल्लू राजकुमार, बंटी और श्रीमती सरिता को आरोपित अभियोग संख्या 720/ 2010 मुकदमा अपराध संख्या 101/2009 धारा 302/ 34 भादवि के तहत दर्ज अपराध से दोषमुक्त करने का आदेश पारित कर दिया।


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