झग सफेद कपड़े और दागदार दामन By संजय त्रिपाठी Wearing white clothes and spots




सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर अपराध के आरोपियों के चुनाव लड़ने पर रोक लगाने से इंकार कर दिया है, लेकिन उसकी टिप्पणी का गहरा असर है। उसने स्पष्ट कहा है कि राजनीति में अपराधी कैंसर की तरह जानलेवा है, संसद कानून बना इसका इलाज करे। राजनीति में दागी नेताओं को लेकर हमेशा ही सुप्रीम कोर्ट सख्त टिप्पणी करता रहा है, लेकिन कोई भी राजनीतिक दल इस पर अमल करना उचित नहीं समझा। नतीजा पूरी तरह राजनीति और अपराध का घोलमेल हो गया है। अपराधीक प्रवृत्ति का व्यक्ति कभी भी समाज व देशहित में नहीं सोच सकता है, क्योंकि जब भी कोई अपराधी प्रवृत्ति के तरफ उन्मुख होता है तो उसके अंदर से मानवता, समाजिकता और देशहित गौढ़ हो जाता है। उसके दिमाग में सिर्फ अपने हित और स्वार्थ ही घूमता है। एक मनोचिकित्यक का कहना है कि अपराध की कुंठा मानव मस्तिष्क में जब घर कर जाती है तो उसकी सोच और कार्य संकृढ हो जाती है, वह हमेशा अपने स्वार्थ हित तथा दूसरे को कैसे नुकसान पहुंचाया जाए इसी विषय में सोचता रहता है। जो अपराधी संगीन अपराध को अंजाम देते हैं उनकी मानसिक संतुलन कुछ अलग तरह की ही बन जाती है। बलात्कार की घटना को अंजाम देने के बाद एक बलात्कारी हमेशा उसी तरह की सोच और कार्य के लिए उद्दत रहता है। इसी तरह अन्य संगीन अपराधियों की भी सोच होती है। ऐसे में अब तक जो भी अपराधी राजनीति में किसी भी तरह प्रवेश किए है वे शरीरिक और कार्य के रूप में तो नेता बन जाते है, लेकिन उनकी सोच अपराधी की ही बनी रहती है। अब प्रश्न उठता है कि जो हमेशा समाज को नुकसान पहुंचाने वाला सोच रखता हो वो कैसे समाज के उत्थान के विषय में सोच पायेगा या उसके लिए कानून बना पायेगा। हथियार चलाने वाला दिमाग समाज हित के विषय में कैसे सोच पायेगा। संविधान निर्माताओं ने यह नहीं सोचा होगा कि राजनीति के क्षेत्र में भी बिहड़ के डाकू आ जायेंगे। कोई भी राजनीतिक पार्टी डाकू, हत्यारा व बलात्कारी जैसे अपराधियों को चुनाव लड़ा कर अपनी जीत की गरांटी सुनिश्चित नहीं करेगा, उस समय उनको यही आभास था। वे नहीं जानते थे कि जो जितना बड़ा दागी होगा उसकी जीत की गरांटी भी उतनी ही बड़ी होगी। क्योंकि राजनीति सही अर्थ में समाज सेवा व देश हित के लिए की जाती है। शुरू में नेताओं ने ही अपराधियों के माध्यम से अपनी जीत पक्की करते रहे। धीरे - धीरे अपराधी ही नेता के चोला में सामने आ गए। आज इसी कारण सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार और लूट - खसोट बढ़ा है। क्योंकि कभी भी अपराधी प्रवृत्ति का व्यक्ति अपनी अपराधी मानसिकता को नहीं बदल पाता है। कहावत भी है कि ‘चोर चोरी से जाए, हेराफेरी से न जाए। ’ देखा जाए तो सुप्रीम कोर्ट भी विधायिका के समक्ष विवश है, तभी तो उसने अपनी लक्षमणरेखा का हवाला देते हुए कानून बनाने का जिम्मा संसद के पाले में डाल दिया। हां उसने गंभीर टिप्पणी करते हुए यह जरूर कहा कि ‘ राजनीति में अपराधीकरण से स्थिति बेहद सोचनीय और विनाशकारी हो गई है। ........ हमें पूरी उम्मीद है कि इस कैंसर के जानलेवा बनने से पहले संसद कानून बनाकर इसका इलाज करेगी। हालांकि हर उम्मीदवार का अपराधीक रिकार्ड साफ शब्दों में जाहिर करने के कई निर्देश जारी किए है। 5 जजों के संवैधानिक बेंच ने कहा कि राजनीति का अपराधीकरण अैर भ्रष्टाचार भारतीय लोकतंत्र के जड़ को दीमक के तरह कमजोर कर रहा है। इस खतरे को रोकने के लिए जरूरी है कि संसद कानून बनए ताकि अपराधी मुकदमों का सामना करने वाले सियासी गलियारों में न घुस पांए और राजनीतिक में अपराधीकरण का खात्मा हो सके। कोर्ट ने यह भी कहा कि लोकतंत्र में नागरिकों को निसहाय की तरह पेश कर भ्रष्टाचार और अपराध के प्रति मौन, बहरा और चुप रहने को मजबूर नहीं किया जा सकता। राष्ट्र बेसब्री से इस बात का इंतजार कर रहा है कि विधायिका और कानून बनाने वाले खुद इस बारे में आगे आएं और कानून बनाएं। क्या राजनीतिकों में ऐसी इच्छा शक्ति देखने को मिलेगी। खैर, देश इस बात का इंतजार कर रहा है कि कोर्ट के फैसले के बाद देश के नीति - नियंता अपराधी और राजनीतिक घोलमेल से लोकतंत्र को कैसे बचा पाते है? 

संजय त्रिपाठी 

tripathi.sanjay290@gmail.com


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