अयोध्या विवाद: अतिरिक्त अधिग्रहीत भूमि लौटाने के लिए याचिका Ayodhya dispute: petition to return additional acquired land



नयी दिल्ली । अयोध्या भूमि विवाद मामले में मंगलवार को उस वक्त नया मोड़ आ गया, जब केंद्र सरकार ने विवादित स्थल के आसपास की अधिग्रहीत गैर-विवादित 67 एकड़ जमीन मूल मालिकों को लौटाने के लिए उच्चतम न्यायालय में एक याचिका दायर की।

याचिका में कहा गया है कि सरकार ने 1991 से 1993 तक 2.77 एकड़ राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवादित स्थल के पास 67 एकड़ भूमि का अधिग्रहण किया था, जिसे मूल मालिकों को लौटा दिया जाना चाहिए। राम जन्मभूमि न्यास ने भी इस अधिग्रहीत भूमि को मूल मालिकों को वापस दिये जाने की मांग की थी।

अयोध्या में 2.77 एकड़ की जमीन पर राम जन्म भूमि और बाबरी मस्जिद का विवाद है। रामलला अभी इसी जमीन पर विराजमान हैं। केंद्र ने अपनी अर्जी में कहा है, “हमने 2.77 एकड़ की विवादित भूमि समेत कुल 67 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया था। अब हम अतिरिक्त जमीन उनके मूल मालिकों को लौटाने की अनुमति चाहते हैं और यथास्थिति बरकरार रखने के 2003 के शीर्ष अदालत के फैसले में बदलाव चाहते हैं।”

सरकार ने न्यायालय के 1994 के फैसले का भी हवाला दिया। केंद्र ने अपनी अर्जी में कहा कि इस्माइल फारुकी केस में न्यायालय ने कहा था कि अगर केंद्र चाहे तो सेंट्रल एरियाज ऑफ अयोध्या एक्ट के तहत मूल विवाद के 0.313 एकड़ इलाके के अलावा अतिरिक्त अधिग्रहीत जमीनें उनके मूल मालिकों को लौटा सकता है।
सरकार ने अपनी याचिका में कहा है कि अधिग्रहीत जमीनें उनके मूल मालिकों को लौटाने की मांग राम जन्मभूमि न्यास की है। न्यास ने अपनी 42 एकड़ जमीन मांगी है। सरकार को एक प्लान मैप बनाकर न्यास और अन्य मूल भूमि मालिकों को उनकी जमीन लौटा देने में सैद्धांतिक रूप से कोई आपत्ति नहीं है, बशर्ते विवादित स्थल तक उचित पहुंच बनी रहे।

शीर्ष अदालत ने 1994 में इस्माइल फारुकी मामले में अपने फैसले में कहा था कि सरकार दीवानी मुकदमे पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले के बाद विवादित भूमि के आसपास की अधिग्रहीत 67 एकड़ जमीन लौटाने पर विचार कर सकती है।

शीर्ष अदालत ने इस मामले की सुनवाई के लिए कोई तारीख मुकर्रर नहीं की है, लेकिन सूत्रों ने उच्चतम न्यायालय रजिस्ट्री के हवाले से इस मामले पर दो सप्ताह के भीतर सुनवाई होने की संभावना जतायी है।
केंद्र सरकार की ओर से दाखिल की गयी अर्जी में मांग की गयी है कि 67 एकड़ जमीन का सरकार ने अधिग्रहण किया था जिस पर शीर्ष अदालत ने यथास्थिति बरकरार रखने का आदेश दिया था। जमीन का विवाद सिर्फ 0.313 एकड़ का है, बल्कि बाकी जमीन पर कोई विवाद नहीं है, इसलिए उस पर यथास्थिति बरकरार रखने की जरूरत नहीं है। सरकार चाहती है कि जमीन का बाकी हिस्सा राम जन्मभूमि न्यास को दिया जाये और शीर्ष अदालत इसकी इज़ाजत दे, साथ ही जमीन वापस करते वक्त यह देखा जा सकता है कि विवादित भूमि तक पहुंच का रास्ता बना रहे। 

गौरतलब है कि अयोध्या स्थित राम जन्म भूमि-बाबरी मस्जिद भूमि-विवाद की सुनवाई के लिए गत 25 जनवरी को पांच-सदस्यीय संविधान पीठ पुनर्गठित की गयी थी, जिसका नेतृत्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई करेंगे और उनके अलावा न्यायमूर्ति एस. ए. बोबडे, न्यायमूर्ति डी. वाई. चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति एस. अब्दुल नजीर को शामिल किया है। न्यायमूर्ति भूषण और न्यायमूर्ति नजीर को न्यायमूर्ति उदय उमेश ललित और न्यायमूर्ति एन. वी. रमण के स्थान पर जगह दी गयी है। 

उच्चतम न्यायालय ने गत 10 जनवरी को सुनवाई के दौरान अयोध्या विवाद मामले में सुनवाई 25 जनवरी तक के लिए स्थगित कर दी थी। उस दिन न्यायमूर्ति गोगोई, न्यायमूर्ति बोबडे, न्यायमूर्ति रमन, न्यायमूर्ति ललित और न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ की संविधान पीठ में जैसे ही इस मामले की सुनवाई शुरू हुई थी, सुन्नी वक्फ बोर्ड की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन ने संविधान पीठ में न्यायमूर्ति ललित की मौजूदगी को लेकर सवाल खड़े किये थे।

श्री धवन ने दलील दी थी कि अयोध्या विवाद से ही संबंधित एक अवमानना मामले में न्यायमूर्ति ललित अधिवक्ता की हैसियत से पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की ओर से पेश हो चुके थे, ऐसी स्थिति में उन्हें मामले की सुनवाई से अलग हो जाना चाहिए।

इसके बाद न्यायमूर्ति ललित ने सुनवाई से हटने की घोषणा कर दी थी। परिणाम स्वरूप न्यायमूर्ति गोगोई को नयी संविधान पीठ की घोषणा के लिए सुनवाई 25 जनवरी तक के लिए मुल्तवी करनी पड़ी थी। तारीख मुकर्रर करने से पहले न्यायमूर्ति गोगोई ने तीन-सदस्यीय पीठ के बजाय पांच-सदस्यीय संविधान पीठ गठित करने को लेकर श्री धवन के सवालों का भी जवाब दिया था।

श्री धवन ने गत वर्ष 27 सितम्बर को तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति ए. अब्दुल नजीर की खंडपीठ के 2:1 से दिये बहुमत के उस फैसले का हवाला दिया था, जिसमें कहा गया था कि अयोध्या विवाद को वृहद पीठ को भेजने की जरूरत नहीं है।

न्यायमूर्ति गोगोई ने कहा था कि तीन-सदस्यीय पीठ के बजाय पांच-सदस्यीय संविधान पीठ का गठन उच्चतम न्यायालय की नियमावली के तहत किया गया है। उधर, संविधान पीठ में मुस्लिम समुदाय के न्यायाधीश को शामिल नहीं किये जाने को लेकर भी नाराजगी जतायी गयी थी। इसी के मद्देनजर नयी पीठ में न्यायमूर्ति नजीर को शामिल किया गया। संविधान पीठ को 29 जनवरी को सुनवाई करनी थी, लेकिन न्यायालय ने गत 27 जनवरी को एक और नोटिस जारी करके 29 जनवरी की सुनवाई एक बार फिर टाल दी। नोटिस में कहा गया है कि सुनवाई के लिए पीठ के एक सदस्य न्यायमूर्ति एस ए बोबडे उपलब्ध नहीं है, इसलिए सुनवाई टालनी पड़ी है। 

गौरतलब है कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 2010 में विवादित जमीन को तीन बराबर हिस्सों में बांटने का फैसला दिया था, जिसमें एक हिस्सा रामलला विराजमान, दूसरा हिस्सा निर्माेही अखाड़ा और तीसरा हिस्सा सुन्नी वक्फ बोर्ड को मिलना था। इस फैसले के खिलाफ दायर 14 अपीलों पर शीर्ष अदालत में सुनवाई होनी है।
इस बीच, कांग्रेस ने अयोध्या में विवादित स्थल के आसपास की अतिरिक्त अधिग्रहीत भूमि लौटाने के संबंध में उच्चतम न्यायालय में दायर याचिका को भारतीय जनता पार्टी की चुनावी चाल करार देते हुए कहा कि चुनाव सामने देखकर भाजपा को अयोध्या की याद आती है।

कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने यहां संवाददाता सम्मेलन में कहा कि भाजपा चुनाव के समय अयोध्या मुद्दे पर सक्रिय हो जाती है। भाजपा जिसे याचिका कह रही है वह अर्जी मात्र है। उन्होंने कहा कि अयोध्या मामला न्यायालय में है और न्यायालय को इस बारे में फैसला करना है, लेकिन भाजपा को चुनाव सामने देखकर जताना होता है कि वह अयोध्या मसले को लेकर सक्रिय है।

विश्व हिन्दू परिषद (विहिप) ने केन्द्र सरकार की अर्जी का स्वागत करते हुए कहा कि न्यास ने इस भूमि को मंदिर के निर्माण के उद्देश्य से लिया था। विहिप ने उम्मीद जतायी कि उच्चतम न्यायालय केन्द्र सरकार के आवेदन पर जल्द से जल्द फैसला देगा।



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