प्रथम महिला क्रान्ति की अग्रदूत थी सावित्री बाई फूले By राम दुलार यादव Savitri Bai Phule, the forerunner of the first woman revolution




                                                         जन्मदिन  पर विशेष



 राम दुलार यादव 
जब सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक व शैक्षणिक विपन्नता मानव समाज में व्याप्त थी, रूढ़िवाद, पाखण्ड, अन्धविश्वास व भ्रम के कारण मानव समाज गरहित अवस्था में पहुँच गया था। दलित, पिछड़े व महिलाओं की दुर्दशा का वर्णन कर रूह कांप जाती थी। उसी काल में महान समाज सुधारक, प्रथम महिला शिक्षिका सावित्री बाई फूले का जन्म 3 जनवरी 1831 को खंडोजी नेबसे, लक्ष्मी बाई के यहाँ हुआ। इनका परिवार खेती, किसानी का कार्य करता था। बाल्यकाल में ही इनका विवाह 9 बर्ष की अवस्था में ही गोविन्द राव फूले, चिमना बाई के पुत्र सामाजिक क्रान्ति के अग्रदूत, अन्याय, अत्याचार, भ्रम, पाखण्ड, अन्धविश्वास के घोर विरोधी, समता, समानता व बन्धुता के पक्षधर महात्मा ज्योतिराव फूले जो उम्र में इनसे बड़े थे से हुआ। पति-पत्नी के लिए विवाह का मतलब समारोह के आयोजन, अच्छे खान-पान के अलावा कुछ नहीं था, इसीलिए जब इन्होने समाज में व्याप्त बुराइयों को दूर करने के लिए संघर्ष किया तो बाल विवाह का घोर विरोध व विधवा विवाह का समर्थन किया। सावित्री बाई फूले दलितों, महिलाओं के साथ होने वाले अमानवीय व्यवहार व अन्याय से अवगत हो गयी थीं, इसीलिए उन्होंने दलितों के उत्थान तथा महिला सशक्तिकरण के लिए रूढ़िवाद से लड़ते हुए उनके जीवन में नया सबेरा आये जीवन-पर्यन्त संघर्ष किया, उनका मानना था यह कार्य शिक्षा के प्रचार-प्रसार से ही सम्भव होगा।


   माली जाति में पैदा हुए ज्योतिराव फूले काफी कठिनाइयों से शिक्षा प्राप्त किये थे। उन्हें शिक्षा के लिए महाराष्ट्र की पाखण्डी पुरोहित जातियों से अपमानित होना पड़ा था, इसलिए वे जाति-व्यवस्था के घोर विरोधी थे तथा कहा करते थे कि “मनुस्मृति, रामायण, पुराण, महाभारत आदि धर्मग्रन्थ शोषण करने के तरीके सिखाते हैं”। वे महाभारत के गान्धारी के साथ किये गये अन्याय को जो पुरोहितों द्वारा अन्धे राजा से शादी कराने तथा पूरे जीवन आंख पर पट्टी बाँधने, रहने के प्रकरण को पूरी नारी जाति का अपमान तथा कलंकित घटना मानते थे। उन्होंने सावित्री बाई फूले को पढाना आरम्भ किया तथा उच्च शिक्षा देकर महिलाओं की शिक्षा के लिए तैयार किया। 1848 में सावित्री बाई फूले अपने पति की प्रेरणा से पुणे में एक विद्यालय की स्थापना की। उस समय मनुवादी व्यवस्था का इतना दुष्प्रभाव था कि किसान व दलित जाति के लोगों का विद्यालय खोलना बड़ा ही दुष्कर कार्य था। अपनी मेहनत, लगन, दृढ संकल्प से एक वर्ष में ही इन्होने समाज के कमजोर वर्गों में शिक्षा के प्रसार के लिए पांच विद्यालय की स्थापना की, लेकिन इनके सामने कठिनाइयाँ यह आती थी कि इन्हें रुढ़िवादी, पाखण्डी समाज में पढ़ाने के लिए शिक्षक नहीं मिल पाते थे। यह घोर परिश्रम कर दलितों, किसानों, महिलाओं के बच्चों को शिक्षा देने के कार्य में लगी रहती थी। आर्थिक तंगी, सामाजिक अपमान सहकर भी वह विचलित नहीं हुई। जिस समय महिलाओं की शिक्षा पर सामाजिक पाबन्दी थी उस समय सावित्री बाई फूले स्वयं शिक्षा प्राप्त की तथा हर वर्ग की लड़कियों को पढ़ने के लिए प्रेरित किया। महिला विद्यालय की स्थापना कर उन्होंने क्रान्तिकारी कार्य किया। उनकी कठिनाइयाँ विद्यालय चलाने में कभी कम नहीं हुई, जब वे स्कूल में बच्चों को पढ़ाने जाती तो समाज-विरोधी उनपर पत्थर फेंकते, रास्ता रोकते, तरह-तरह के लाक्षन लगाते, उनकी जाति को भड़काते, गोबर व मानव मल भी उन पर फेंक देते, लेकिन वह कभी विचलित नहीं हुई। वह अपने साथ पहनने के लिए एक जोड़े कपड़ा और ले जाती उसे विद्यालय में बदल कर छात्राओं को शिक्षित करने में लग जाती तथा मन में यह सोचकर उन लोगों के प्रति कटुता नहीं रखती थीं कि वे दिग्भ्रमित लोग अन्धविश्वासी, पाखण्डी है जबकि सावित्री बाई फूले का लक्ष्य छुवा-छूत मिटाना, महिलाओं, दलितों को शिक्षित करना, विधवा विवाह कराना, महिलाओं को रूढ़िवाद, अन्याय, अत्याचार, अमानवीय व्यवहार से मुक्ति दिलाना था। 
     वे मराठी कविता के माध्यम से भी लोगों को जागृति करती थी। उनकी गिनती अच्छी कवियित्री में भी होती थी। वह जातिभेद, नस्लभेद, रंगभेद को भी समाज का कोढ़ मानती थी, पुरजोर विरोध करती थी उनका लक्ष्य दलित, महिला चाहे वह किसी भी वर्ग की हो उसमे अपने अधिकारों को समझने की चेतना पैदा करना था। वह अपने घर पर एक गर्भवती विधवा ब्राह्मणी को शरण देकर प्रसव करवाया, जबकि पुरोहित उसका विरोध कर रहे थे, उसके पैदा हुए पुत्र यशवंत राव को गोद लेकर शिक्षित कर डाक्टर बनवा निराश्रितों के लिए अस्पताल खुलवाया जहाँ उनका इलाज निःशुल्क होता था। अपने जीवन काल में उन्होंने 18 विद्यालय की स्थापना हर वर्ग की महिलाओं की शिक्षा के लिए तथा कई प्रसव गृह स्थापित किये जिससे नवजात की देख-भाल अच्छी प्रकार से हो सके। सावित्री बाई फूले ने विधवाओं के लिए भी केन्द्र की स्थापना की तथा उन्हें पुनर्विवाह के लिए प्रोत्साहित किया।
    उनके पति द्वारा स्थापित “सत्य शोधक समाज” की महिला शाखा का उन्होंने सफलता पूर्वक संचालन किया। उन्होंने कन्या भ्रूण हत्या, बाल बेश्यावृति को रोकने का कार्य किया, यही नहीं मन्दिरों में व्याप्त दासी-प्रथा मन्दिरों में पुरोहितों द्वारा मासूम बच्चियों के साथ होने वाले अनाचार का घोर विरोध किया। वह निर्भीकता पूर्वक असामाजिक तत्वों के काले कारनामे का विरोध जीवन पर्यन्त करती रही। वह दहेज प्रथा का भी विरोध करते हुए अपने पति के सानिध्य में बिना पुरोहित, बिना दहेज की कई शादियाँ कराकर समाज को नई-दिशा देने का कार्य किया। डा0 यशवंत राव को, जो इनका दत्तक पुत्र था अन्तर्जातीय विवाह कराकर रूढ़िवाद पर करारी चोट की। अछूतों के लिए पानी का जलाशय अपने घर में बनवाना तथा उन्हें सार्वजनिक रूप से पीने का पानी उपलब्ध कराना जबकि उस समय दलितों को सवर्ण कुओं, तालाबों पर चढ़ने नहीं देते थे बड़ा ही दुष्कर कार्य था। सावित्री बाई फूले विधवाओं के सिर मुडवाने की प्रथा का भी विरोध किया तथा नाई जाति से आग्रह किया कि विधवाओं के मुंडन में अपना योगदान न दें और हडताल करवा दी। विधवाओं की स्थिति सुधारने, सती-प्रथा की रोक के लिए पूरा जीवन अर्पण कर दिया।
      28 नवम्बर 1890 में महात्मा ज्योतिराव फूले के निधन के बाद “सत्य शोधक समाज संस्था” का सम्पूर्ण दायित्व सावित्री बाई फूले पर आ गया। उन्होंने संस्था के उद्देश्यों व लक्ष्यों के अनुरूप समाज के उपेक्षित वंचित वर्ग चाहे वह महिला हो चाहे पुरुष उन्हें न्याय दिलाने, शिक्षित करने तथा सम्पूर्ण मानव समाज के लिए शिक्षा, सेवा, सहयोग करने में अपना जीवन अर्पण कर दिया। वह प्रथम महिला शिक्षिका, समाज सुधारक रही। 19वीं शताब्दी में परम्पराओं, प्रथाओं, रुढियों से संघर्ष करना इतना आसान नहीं था वह एक मिसाल है। नारी जाति को स्वाभिमान व सम्मान से जीवन-यापन करने के लिए सर्वस्व अर्पण कर दिया। 1897 में पूना में प्लेग फैल गया, अपने दत्तक पुत्र डा0 यशवंत राव के साथ वह स्वयं मरीजों की सेवा करती, जिनका इलाज कोई अस्पताल नहीं करता जो धनहीन, अस्पृश्य थे उनकी सेवा करते उन्हें भी प्लेग हो गया। अथक परिश्रम के कारण बीमारी को झेल नहीं पायी और 10 मार्च 1897 को उनका निधन हो गया। उन्होंने वंचितों, पीड़ितों, दलितों व हर वर्ग की महिलाओं के लिए जो अनुकरणीय कार्य किया, देश सेवा में योगदान दिया देश-समाज उनका शदियों तक ऋणी रहेगा।
   आज भी बेटी पढाओ, बेटी बचाओ, महिलाओं के अधिकारों व सशक्तिकरण के लिए तथा कन्या भ्रूण हत्या रोकने के लिए सामाजिक न्याय, आर्थिक असमानता दूर करने के लिए समाज में सद्भाव, भाईचारा, न्याय, बन्धुत्व की भावना पैदा करने के लिए, अन्याय, अत्याचार, अनाचार, असहिष्णुता को समाप्त करने के लिए जिस कार्य को बहुत पहले सावित्री बाई फूले ने किया आज 21वीं शताब्दी में करने की आवश्यकता है, उनके विचार सदियों तक प्रासंगिक रहेंगें। 
                                                                                                                                                                     राम दुलार यादव 
( समाजवादी चिन्तक )
                                                                            
                                                                        



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