सांप्रदायिक नागरिकता संशोधन विधेयक की केवाईएस ने की कड़ी भर्त्सना The KYS denial of the Communal Citizenship Amendment Bill



  • श्रीलंका एवं म्यांमार के उत्पीड़ित अल्पसंख्यकों को विधेयक के दायरे से बाहर रखना पूर्णतः सांप्रदायिक कदम
  • प्रवासियों के प्रति दुर्भावना दूर करने के लिए सभी राज्यों में राजकीय कोटे के आधार पर उत्पीड़ित प्रवासियों को शरण देना चाहिएरू केवाईएस


नई दिल्ली, ( विशेष संवाददाता )  क्रांतिकारी युवा संगठन (केवाईएस) भाजपा द्वारा लाये गये सांप्रदायिक नागरिकता संशोधन विधेयक की कड़ी भर्त्सना करता है। ज्ञात हो कि इस सांप्रदायिक विधेयक से बांग्लादेश, अफगानिस्तान और पाकिस्तान के अल्पसंख्यकों को भारत में नागरिकता लेने का अधिकार होगा। मगर, इस विधेयक द्वारा भाजपा का सांप्रदायिक चरित्र साफ प्रदर्शित होता है, क्योंकि सिर्फ तीन देशों के ही अल्पसंख्यकों को इस विधेयक के दायरे में लाया गया है, जबकि अन्य देशों के अल्पसंख्यकों को जानबूझकर इसके दायरे से बाहर रखा गया है। यह विधेयक इस तथ्य पर आधारित है कि पड़ोसी मुस्लिम-बहुल देशों में गैर-मुस्लिम समुदायों के साथ धार्मिक उत्पीड़न होता है, परन्तु अन्य देशों(श्रीलंका,म्यांमार) के उत्पीड़ित समुदायों को पूरी तरह नजरंदाज किया गया है।

ज्ञात हो कि हालिया समय में श्रीलंका और म्यांमार के अल्पसंख्यकों को भयंकर उत्पीड़न झेलना पड़ा है। इसी सन्दर्भ में, अपना सांप्रदायिक चेहरा दिखाते हुए भाजपा सरकार ने म्यांमार के रोहिंग्या समुदाय को अवांछित गैरकानूनी प्रवासी बतलाकर उनके भारत में रहने को लेकर दिक्कतें और समस्याएं पैदा की। रोहिंग्या समुदाय के लोगों का म्यांमार सरकार द्वारा किये गए नियोजित नरसंहार के कारण उन्हें पड़ोसी दशो जैसे- बांग्लादेश और भारत में शरण लेने को मजबूर होना पड़ा था, मगर भाजपा सरकार द्वारा उन्हें वापस भेजने की पुर-जोर कोशिश की गई। साफ है कि सांप्रदायिक भाजपा के लिए कुछ देशों के उत्पीड़ित समुदाय ‘गैरकानूनी’ प्रवासी हैं और उनके लिए भाजपा पूर्णतः संवेदनहीन हैं।

केवाईएस सांप्रदायिक उद्देश्य से लाये गये नागरिकता संशोधन विधेयक की कड़ी भर्त्सना करता है और सभी उत्पीड़ित प्रवासियों को देश में शरण देने का पक्षधर है। साथ ही, केवाईएस का मानना है कि उत्पीड़ित प्रवासियों के खिलाफ जो दुर्भावना उन राज्यों के स्थानीय निवासियों में पनप रही है, उसको दूर करने के लिए केंद्र सरकार द्वारा कोटे के आधार पर शरणार्थियों को भारत के विभिन्न राज्यों में शरण देना चाहिए।



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