राष्ट्रहित , समाज हित और मानव हित के लिए जन्म लिए थे विवेकानन्द Vivekananda was born for national interest, social interest and human interest



                                           राष्ट्रीय युवा दिवस (12 जनवरी) पर विशेष

स्वामी रामकृष्ण परम हंस असीम धैर्य एवं उत्कटलग्न के साथ अपने युवा शिष्य नरेंद्र नाथ की क्रांतिकारी मुमुक्षा पर ध्यान केन्द्रित किये हुए थे ताकि उसे भ्रम से बाहर निकाल सकें और नरेंद्रनाथ भी अपने गुरु के प्रति पूर्ण समर्पित थे। प्रशिक्षण का क्रम चलता रहा और स्वामी रामकृष्ण ने अपना अधिकतम ज्ञान नरेंद्र को बुद्धि-गत कर दिया। वे चाहते थे कि दक्षिणेश्वर में शिष्य मंडली का नेतृत्व नरेंद्रनाथ करे। परंतु नरेंद्रनाथ के मन में कुछ और भी चल रहा था। उन्होंने एक दिन अपने गुरु से निर्विकल्प समाधि (स्वयंसिद्ध) लगाने का आशीर्वाद मांग लिया। स्वामी रामकृष्ण तो जैसे बिफर गये...। वे आश्चर्यचकित हो नरेंद्रनाथ को लगभग डांटते हुए ‘‘बोले... ये क्या...? मैं तो समझता था कि तुम एक दिन विशाल वट वृक्ष की तरह विस्तार करके दुनियां के असंख्य लोगों को झुलसाने वाले कष्टों से मुक्ति दिलाकर आश्रय प्रदान करोगे... परन्तु तुम तो केवल अपना ही कल्याण चाहते हो... तुम्हारी सोच इतनी छोटी हो सकती है, मुझे तुम पर लज्जा आती है।’’ गुरु की इस अधिकारपूर्ण डांट से नरेंद्र सिहर उठे और तत्क्षण अपना विचार बदलने की सूचना गुरु को दे दी। स्वामी रामकृष्ण ने रूंधे गले से कहा ‘‘....अभी वह काम नहीं हुए हैं जिनके लिए तुम्हारा (नरेंद्र का) जन्म हुआ है। अपने महाप्रयाण से चार दिन पूर्व गुरु रामकृष्ण परमहंस ने अपने परम शिष्य नरेंद्रनाथ को अपनी दिव्य शक्ति स्थानांतरित कर दी और कह दिया- ‘‘अब से तुम विवेकानन्द हो गये हो और जाओ! राष्ट्रहित में, समाज हित में, मानव हित में कार्य करो। बहुत लोगों को तुम्हारी आवश्यकता है...। मेरे पास अब देने को कुछ शेष नहीं है...।’’ और विवेकानन्द से विछोह होने की आशंका में वे बालक की तरह रोने लगे...। विवेकानन्द भी भारी मन से आंखों में आंसू ले आये।
गुरु की आज्ञा को शिरोधार्य करके, देश में अशिक्षा, अज्ञानता सामाजिक बुराइयों व अनेकानेक रूढियों को समाप्त करने और लोगों में एक नयी चेतना लाने के लिए पहले अपने देश में घूमे। सर्वप्रथम वे बनारस गये वहां से प्रयागराज (इलाहाबाद) लखनऊ हाथरस आगरा वृन्दावन होते हुए ऋषिकेश गये। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान गुजरात महाराष्ट्र मैसूर, केरल, मद्रास आदि राज्यों में और वहां के तीर्थस्थलों में भी गये। सभी स्थानों पर भारत का गौरवशाली दर्शन हुआ, चाहे वह आध्यात्मिक हो अथवा सांस्कृतिक रहा हो। इन यात्राओं मतें देश के अनेक श्रद्धालुओं, प्रभावशाली राजाओं एवं रियासतदारों से उनका मिलना हुआ। अनेक अनुयायियों एवं गुरु-भाईयों की सहायता से वे विदेश यात्रा पर भी गये। यद्यपि उन दिनों हिन्दुओं की विदेश यात्रा को शुभ नहीं माना जाता था, परंतु लोक कल्याण के लिए उन्हें इस बात की चिन्ता नहीं थी। उनकी संकल्पशक्ति बहुत दृढ़ थी एक प्रकार से वे सकारात्मक हठी थे। लक्ष्य प्राप्ति के मार्ग में जो कठिनाइयां उन्हें आती थी उनसे निपटने की क्षमता उनमें थी। विदेशों में वे जापान, चीन, अमेरिका, इंग्लैंड, बोस्टन तथा शिकागो की यात्रा पर गये। विदेशों में शिक्षा एवं औद्योगिकी का प्रगतिशील स्वरूप देखकर उन्हें भारत की याद आती कि क्यों न हमारे देश के युवा भी इतने परिश्रमी हों, इतने शिक्षित हों... आदि। अपने वहां के अनुभवों से अपनी पीड़ाओं से यहां अपने मित्रों को अपने पत्रों से निरन्तर अवगत कराते रहते थे। स्वामी विवेकानन्द के पत्रों का संकलन एक समृद्ध साहित्य है।
वे चाहते थे कि हमारे युवा संकीर्णता से उबरकर व्यापकता का हिस्सा बनें। इसके लिए प्रायरू एक उदाहरण अपने व्याख्यान में दिया करते थे कि... ‘‘एक सिन्धु मण्डूक किसी प्रकार एक कुएं में आ गया। वहां पर एक कूप मण्डूक पहले से हो था। एक दो दिन दोनों में वार्ता नहीं हुई। सिन्धु मण्डूक वहां की संकीर्णता से दुखी था और कूप मण्डूक किसी आगन्तुक के कारण दुखी था। अन्ततरू एक दिन सिन्धु मण्डूक ने चुप्पी तोड़ी और कूप मण्डूक से पूछा- ‘‘क्या तुम्हें यहां घुटन महसूस नहीं होती? तुम कैसे यहां रहते हो?’’ कूप मण्डूक जो कि वहां बड़ा प्रसन्न रहता था उसे तो वह कूप ही सम्पूर्ण सृष्टि लगता था, थोड़ा खिन्न हुआ और बोला कि ‘‘तुम्हारा आवास कुछ बड़ा है क्या? सिन्धु मण्डूक समझ गया कि इसे समुद्र की विशालता का बोध नहीं है वह बोला हां, काफी बड़ा है। कूप मण्डूक ने एक भरपूर छलांग कूप में ही लगाई और बोला- इतना बड़ा...?’’ सिन्धु मण्डूक ने कहा- इससे भी बड़ा...। कूप मण्डूक ने पूरी शक्ति लगाकर फिर एक छलांग कूप में ही लगाई और गर्वित भाव से बोला इससे बड़ा तो नहीं होगा? सिन्धु मण्डूक गम्भीर हो गया और बोला- भाई जितने भी विश्व के कूप हैं, उन सबको भी मिलाकर, उनसे भी बड़ा है मेरा आवास (सिन्धु)। कूप मण्डूक चिढ़ गया और बोला- मेरे आवास से बड़ा तो विश्व भी नहीं है सबसे बड़ा तो मेरा ही आवास है। यहां क्या नहीं है मेरे जीवन के लिए तो यही सब कुछ है। सिन्धु मण्डूक ने समझाने का प्रयत्न किया कि सिन्धु असीम है बहुत विशाल है वहां अनेकता है अनेक अवसर हैं। अस्तु, इस उदाहरण के माध्यम से विवेकानन्द अपने देश के युवा वर्ग को सचेत करना चाहते हैं कि देश् के बाहर भी जाकर देखो कि विश्व में किस गति से प्रगति हो रही है। 
स्वामी विवेकानन्द युवा वर्ग को उद्बोधित करते रहे हैं और उनसे अपेक्षा भी रखते हैं। वे केवल पुस्तकीय ज्ञान के समर्थक नहीं है उनके अनुसार शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति का शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, धार्मिक, नैतिक, भावनात्मक एवं चारित्रिक विकास होना चाहिए। विवेकानन्द जी की परिकल्पना में ऐसे युवकों का निर्माण होना चाहिए जो आभावान हों, पुष्ट गात्र बलशाली हों, मन में प्रचण्ड इच्छाशक्ति हो, पांडित्यपूर्ण बुद्धि हो, जीवन में स्वावलम्बन हो तथा हृदय में महापुरुषों की गाथाएं अंकित हों। नवयुवक दुर्बल होने का स्वांग न करें अपितु ये निश्चय मानें कि वे एक अमर आत्मा हैं सत्य सनातन हैं आत्म, स्वच्छन्द जीवन है। अपने जीवन का एक लक्ष्य निर्धारित करें प्रगति के सपने देखें फिर उन स्वप्नों को साकार करने के लिए पूरे मनोयोग से जुट जाएं। कोई बाधा नहीं जो आपको रोक सकेगी। अपने कर्म पर ध्यान एवं विश्वास स्थापित रखें। 
अपने परिभ्रमण के समय स्वामी विवेकानन्द को अनेक प्रकार के अनुभव हुए। उनमें से कुछ घटनाओं का वर्णन उनकी ‘परिव्राजक’ पुस्तक में मिलता है ऐसी ही एक घटना का वर्णन इस प्रकार है- खेतड़ी से विदा होकर आप जयपुर पहुंचे तो वहां राजा साहब ने एक विशेष बैठक में एक गायिका (गणिका) को बुलवा लिया और नृत्य-गीत का आयोजन किया। महाराजा ने एक आदमी स्वामी जी के पास भी भेजा कि आप भी इस आयोजन का आनन्द लें। स्वामी जी ने उत्तर दिया-  किसी सन्यासी के लिए नर्तकी के नृत्यगीत में सम्मिलित में होना उचित नहीं है।’’ स्वामी जी के इस जवाब से नर्तकी बहुत दुखी हो गयी और नारी सुलभ अभिमान से उसकी अंतरआत्मा रो उठी, उसने लगभग रोते हुए सूरदास का यह पद मधुर कण्ठ से गाया-
प्रभु मेरो अवगुन चित न धरो।
समदरसी है नाम तिहारो चाहे तो पार करो।।
अज्ञानी कूं भेद ऊपजै ज्ञानी क्यूं भेद करो,
एक माया एक ब्रह्म कहावे सूरदास झगरो।
नर्तकी के कोकिल कण्ठ की आर्तवाणी स्वामी जी ने भी पास के कमरे में बैठकर सुनी। उस पर स्वामी जी स्वयं को न रोक सके- हा! मैं अद्वैत वेदान्तवादी सन्यासी हूं। मेरी भेद बुद्धि ऐसी है कि मैंने उसे गणिका कह कर देखा तक नहीं। उसका आर्त स्वर सुनकर मेरी आंखों के सामने से एक पर्दा हट गया।’’ स्वामी जी दुखी हृदय से उस गणिका के पास गये और इस दुव्र्यवहार के प्रति खेद व्यक्त किया। अज्ञान निर्धनों, पीडि़तों को ही नहीं बल्कि समाज में चिरकाल तक घृणित गणिका को भी करूणा के साथ आशीर्वाद दे गये। 
शिकागो के धर्म सम्मेलन में स्वामी जी की उपस्थिति में स्वामी जी की उपस्थिति एवं व्याख्यान के माध्यम से भारत एवं स्वामी विवेकानन्द का व्यापक प्रभाव हुआ। थियोसोफिकल सोसायटी की नेत्री श्रीमति एनी बेसेन्ट ने ‘ब्रह्मवादिन’ पत्रिका के एक अंक में लिख है- ‘‘महिमामयमूर्ति, गैरिक वस्त्र से भूषित शिकागो नगर के धूममलिन वक्ष पर भारतीय सूर्य की तरह दीप्तमान, उन्नत शिर, मर्मभेदी दृष्टि, चंचल होंठ, मनोहर स्वामी विवेकानन्द, मेरी दृष्टि में सन्यासी के बजाए योद्धा ही हैं। प्रतिनिधियों में सबसे कम आयु के होते हुए भी प्राचीनतम सत्य की जीती जागती मूर्ति स्वामी जी ने अपनी जन्मभूमि की गौरव गाथाओं को न भूलकर भारत के धर्म संदेश की घोषणा की थी।’’
नोबेल पुरस्कार के प्रथम भारतीय विजेता गुरुदेव रविन्द्रनाथ टैगोर ने कहा है- ‘‘यदि वास्तव में भारत को जानना है तो स्वामी विवेकानन्द का अध्ययन कर लो- उनमें कहीं नकारात्मकता नहीं है, सब कुछ सकारात्मक है।’’
12 जनवरी, स्वामी विवेकानन्द जयंती को भारतवर्ष में ‘राष्ट्रीय युवा दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। वास्तव में भारत की युवा पीढ़ी और जागरूक जनता को आने वाले कठिन समय एवं उसके भेदन का ज्ञान करा दिया था। आज की युवा पीढ़ी विदेशों में शिक्षा का आदान-प्रदान कर रही है। नवीनतम वैज्ञानिक तकनीकियों से स्वयं को, समाज को एवं राष्ट्र को समुन्नत कर रही है। इसके मूल में स्वामी विवेकानन्द ही हैं। ऐसा मेरा मानना है। हम सबको उस परम सन्यासी योद्धा का आभार मानना चाहिए कि उनके बताए रास्ते आज भी प्रासंगिक है। ऐसे महान व्यक्तित्व को कोटिशः नमन ।
-नरेन्द्र कुमार शर्मा
राष्ट्र पुरस्कृत शिक्षक



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