भारत में सरकारी स्कूलों की बदहाल स्थिति पर हुआ सम्मेलन Conference on the Bad Status of Government Schools in India



  • छात्रों के बीच हुआ जनमत-संग्रह
  • स्कूली शिक्षा के निजीकरण को खत्म करने की उठाई मांग
  • केवाईएस ने सभी को केजी से पीजी तक अनिवार्य और समान शिक्षा देने की भी मांग उठाई


नई दिलली, ( विशेष संवाददाता )  क्रांतिकारी युवा संगठन (केवाईएस) ने अखिल भारतीय शिक्षा अधिकार मंच (ए.आई.एफ.आर.टी.ई.) के साथ मिलकर अंबेडकर विश्वविद्यालय में ‘सरकारी बनाम प्राइवेट स्कूलः दोहरी शिक्षा नीतिः समस्याएँ एवं समाधान’ विषय पर सम्मेलन का आयोजन किया। यह सम्मेलन 18 फरवरी को होने वाली अखिल भारतीय शिक्षा हुंकार रैली की एक कड़ी के तौर आयोजित किया गया था। सम्मेलन में प्रोफेसर अनिल सदगोपाल, पूर्व डीन, शिक्षा संकाय, दिल्ली विश्वविद्यालयय डॉ. विकास गुप्ता, इतिहास विभाग, डीयूय और श्री आलोक कुमार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं स्वतंत्र शोधार्थी ने बतौर वक्ता शिरकत की। सम्मेलन में भारत में व्याप्त असमान शिक्षा प्रणाली पर चर्चा की गयी जिससे समाज मे गैर-बराबरी पनपती है और साथ ही, इसको खत्म करने के तरीकों पर भी बात रखी गयी।

प्रोफेसर अनिल सदगोपाल ने अपनी बात रखते हुए समान स्कूली प्रणाली को स्थापित करने की बात कही। ज्ञात हो कि मौजूदा दौर में राज्य-सरकारों द्वारा चलाये जा रहे सरकारी स्कूलों में छात्रों को बहुत ही कठिनाई में पढने को मजबूर होना पड़ता है। यह स्कूल ज्यादातर बहुत ही लचर तरीके से चलाये जाते हैं, जहाँ पर शिक्षकों की संख्या भी पूरी नहीं होती है। साथ ही, इन स्कूलों में बुनियादी सुविधाएँ जैसे स्वच्छ शौचालय और साफ पानी भी मुहैया नहीं होता है। यह एक कड़वी सच्चाई है कि इन बुनियादी सुविधाओं के अभाव में जो छात्र बारहवीं तक सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं,वो कड़ी मेहनत के बावजूद सरकारी विश्वविद्यालय में दाखिला हासिल नहीं कर पाते हैं। डॉ. विकास गुप्ता ने किस तरह सरकारी नीतियों द्वारा सबको समान शिक्षा न दिये जाने पर अपनी बात रखी।  

श्री आलोक कुमार ने अपने वक्तव्य में दोहरी-शिक्षा नीति और स्कूली शिक्षा के निजीकरण से पनपने वाली गैर-बराबरी पर चिंता व्यक्त की। उन्होने कहा कि रेगुलर में दाखिला पाने वाले बहुसंख्यक छात्र प्राइवेट स्कूलों से और सुसम्पन्न परिवारों से आते हैं। जबकि समाज के निम्न तबके से आने वाले छात्र रेगुलर कोर्सों से बाहर हो जाते हैं और मजबूरी में कॉरेस्पोंडेंस या ओपन में एडमिशन ले लेते हैं। देश के विभिन्न कॉरेस्पोंडेंस विभागों में पढने वाले ज्यादातर छात्र एससी, एसटी, ओबीसी, अल्पसंख्यक समुदाय से आते हैं जो दोहरी शिक्षा की आग की जलन को- सरकारी स्कूल से लेकर दूरस्थ शिक्षा में घटिया स्तर की उच्च-शिक्षा तक  लगातार सहते हैं। यह एक शैक्षणिक नस्लभेद है जो निरंतर पुनरुत्पादित होता रहता है। 12वीं की परीक्षा पास करने वाले छात्रों की कुल संख्या( जो पहले ही काफी कम और निराशाजनक है) का केवल छोटा हिस्सा ही उच्च शिक्षा में किसी तरह पहुँच पाता है। जिससे यह दिखता है कि उच्च शिक्षा की चाह रखना, विशेषकर रेगुलर माध्यम से उच्च शिक्षा की चाह रखना बहुसंख्यक भारतीय युवाओं के लिए दूर का स्वप्न है।
सम्मेलन मे शामिल छात्रों और लोगों के बीच समान शिक्षा को लेकर जनमत-संग्रह भी कराया गया। ज्यादातर छात्र जो सरकारी स्कूलों और कॉरेसपोंडेंस से थे, उन्होने दोहरी-शिक्षा नीति को खत्म करने और सभी के लिए समान और अनिवार्य शिक्षा के पक्ष में अपना मत दिया। आने वाले दिनों मे क्रांतिकारी युवा संगठन सभी छात्रो के लिए केजी से परास्नातक (पीजी) के लिए समान और अनिवार्य शिक्षा को लेकर अपना आंदोलन तेज करेगा।




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