खुल्लम - खुला : चोकीदार के भाग्य बड़े सजनी !



राजनीति का पैतरा भी सबके समझ में नहीं आता। 2014 के चुनाव में चायवाला ही कहर ढा दिया। इस चुनाव में लग रहा है चोकीदार भी अपना रंग जरूर दिखायेगा। गिरगिट के तरह रंग बदलने वाले नेताओं के चंगुल में इस बार चैकीदार फंस गया है। पिछली बार के आम चुनाव में चायवाला फंसा था। उसकी तो भाग्य ही खुल गई। चारो तरफ चायवाला की चर्चा ही होने लगी। हमारे एक साथी चाय की दुकान चलाते थे। पहले वह मुलायम यादव के समर्थक थे। एटा के होने के चलते वह मुलायम या अखिलेश की जरा सा भी बुराई सुनने को तैयार नहीं थे। लेकिन जब चायवाले के नाम से मोदी प्रधानमंत्री बन गये तब से वह भी मोदी के समर्थक बन गये है। अब मोदी के नाम से दिनभर चाय की दुकान पर लोगों से लड़ते रहते हैं। यह भी एक कला है। विपक्षी के बात को छिन कर उसी को मोहरा बना मैदान - ए - जंग में फतह पा लेना। ऐसा ही हुआ लेकिन क्या इस बार भी ऐसा ही होगा ? इसे लेकर लोगों में चुनाव से भी ज्यादा उत्सुकता जग गई है। राहुल जी अपनी रैली या सभा में आज कल सिर्फ इतना ही कहते हैं - ‘चोकीदार- !’  आगे का शब्द भीड़ पूरा करती है - ‘ चोर है।’ किसी - किसी जगह पर तो वे दो - तीन बार इसी तरह बोल रहे है। अब मोदी ने इसी को अपना हथियार बनना शुरू कर दिया है। हम सब चोकीदार  है का नारा दे रहे है। उन्होंने  चोकीदार शब्द को जनता से जोड़ने का प्रयास किया है।  देखा जाय इस बार यह श्लोगन किस करवट बैठता है ? भृगु ऋषि के श्राप से विष्णु भगवान के दरबार में चोकीदार जय और विजय को राक्षस बनना पड़ा था। देखा जाय तो चोकीदार के कंधे पर जिम्मेदारी का भार होता है और उसके अनुपात में उन्हें तिरष्कार ही मिलता है। राहुल गांधी के नारे से महाराष्ट्र के चैकीदार लाल कपड़ा पहन कर बिरोध कर रहे हैं, वहीं कुछ कोर्ट के शरण में भी गए है। उनका आरोप है कि हमारे नाम से सिर्फ मोदी को चोर नहीं कहा जा रहा है यह तो पूरे हमारे समुदाय को चोर की श्रेणी में रखा जा रहा है। चोकीदार शासन का एक अंग है जो गांवों में रात में पहरा देता और पुलिस प्रशासन को हर तरह की सूचना तथा क्षेत्रीय जानकारी प्राप्त कराता है। हालांकि यह श्लोगन शोले के डाॅयलाग से भी पाॅपुलर हो गया हैं। छोटे - छोटे बच्चे भी  नारे लगा रहे है - ‘चोकीदार ........................ !’ एक समय बिहार में चोकीदार का भाग्य बदला जब लालू यादव मुख्यमंत्री बने। उस समय तक वे शासन का एक हिस्सा तो होते थे, लेकिन स्थायी नौकरी नहीं होती थी। लालू ने चैकीदारों को बिहार में स्थायी नौकरी देकर और उनका वेतन बढ़ा कर उन्हें भी शासन का एक अंग बना दिया। इस बार चोकीदार  का भाग्य कैसे खुलेगा यह तो अब चुनाव के बाद ही पता चलेगा। अब तो इसका निर्णय 23 मई को ही होगा कि चोकीदार इमानदार है या चोर है। 
संजय त्रिपाठी    



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