फ्रांस ने बढ़ाया हौसला By संजय त्रिपाठी France boosted spirits



जैश - ए- मोहममद के सरगना मसूद अजहर को वैश्विक आतंकवादी घोषित किये जाने के प्रयास में चीन का अडंगा कोई इसका नया रूख नहीं है। यह उसका चैथा कदम है जिसमें वह इस बार भी सफल हुआ है। लेकिन फ्रांस के कदम ने भारत का हौसला बढ़ाया है और यह एहसास कराया है कि चाहे चीन भले ही पाकिस्तान का साथ दें, लेकिन दुनिया के अन्य देश भारत के साथ हैं और आतंकवाद को जड़ से उखाड़ फेंकने को तैयार हैं। यूएन सुरक्षा परिषद् से बैन लगाने के प्रस्ताव पर चीन के वीटो के बाद फ्रांस अब खुद मसूद के खिलाफ एक्शन लेने जा रहा है। फ्रांस ने जैश सरगना मसूद की संपत्तियां जब्त करने का फैसला किया है। जैश के खिलाफ फ्रांस की अब तक की यह सबसे बड़ी कार्रवाई मानी जा रही है। फ्रांस ने स्पष्ट कहा है कि आतंकवाद के मामले में वह भारत के साथ है। फ्रांस के गृह मंत्रालय, वित्त मंत्रालय और विदेश मंत्रालय के एक संयुक्त बयान में कहा गया है कि हम मसूद अजहर को यूरोपीय यूनियन की आतंकवादियों की सूची में शामिल करने को लेकर भी बात करेंगे। तीन दिन पूर्व फ्रांस, अमेरिका और ब्रिटेन ने मसूद अजहर पर प्रतिबंध लगाने के लिए संयुक्त राष्ट्र में प्रस्ताव रखा था, लेकिन चीन ने अंतिम समय में अपनी वीटो की ताकत का प्रयोग कर उसे चैथी बार बचा लिया। उसने प्रस्ताव के आने पर तकनीकि कारणों का हवाल देते हुए साफतौर पर कह दिया कि वह मसूद अजहर पर प्रतिबंध लगाने की अपील को समझने के लिए और समय चाहता है। सवाल है कि जैश-ए-मोहम्मद, मसूद अजहर या उसकी गतिविधियों के संबंध में अब क्या छिपा हुआ है कि उसे समझने के लिए चीन को अलग से कोशिश करनी पड़ेगी! जबकि 14 फरवरी को पुलवामा के हमले में 40 जवानों के शहीद होने की घटना की जिम्मेदारी खुलेआम जैश - ए - मोहम्मद ने ली है। हालांकि चीन के इस तरह की पैतरें की उम्मीद पहले से ही थी, लेकिन अभी 27 फरवरी को चीन में हुए विदेश मंत्रियों के बैठक में संयुक्त बयान जारी कर आतंकवाद के विरूद्ध प्रयास करने की वकालत की गई थी। उस समय यह उम्मीद जगा था कि इस बार संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् की बैठक में चीन अडंगा नहीं लगायेगा। हालांकि उम्मीद तो थी, लेकिन पूर्ण विश्वास नहीं था। मसूद अजहर के संगठन जैश-ए-मोहम्मद को करीब अठारह साल पहले ही आतंकी घोषित किया जा चुका है। यह समझना मुश्किल है कि चीन की नजर में आतंकवादी होने की परिभाषा क्या है और आखिर किन वजहों से वह वैश्विक मत को दरकिनार करके मसूद अजहर को लेकर इतना नरम रुख बनाए हुए है। कुछ समय पहले चीन के विदेश मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने कहा था कि हम भारत के साथ आतंकवाद विरोधी और सुरक्षा सहयोग के मोर्चे को मजबूत करना चाहेंगे और दोनों देश मिल कर क्षेत्रीय शांति और सुरक्षा के लिए काम करेंगे। सवाल है कि जिस व्यक्ति को तकनीकी रूप से अंतरराष्ट्रीय आतंकी घोषित कराने के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सदस्य अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस जैसे देश भी पहल कर रहे हैं, उसका बचाव करके चीन भारत के साथ आतंकवाद विरोध के किस मोर्चे को मजबूत करने की बात करना चाहता है? चीन अपने स्वार्थ हित में ऐसा कर रहा है। दरअसल चीन ने पाकिस्तान में बड़े पैमाने पर निवोश कर रखा है। चीन - पाक आर्थिक गलियारा और वन बेल्ट वन रोड खास तौर से जैश के रहमोकरम पर है। क्योंकि उसका यह प्रोजेक्ट कश्मीर के वह हिस्सा जो पाकिस्तान के अधीन है वहां से होकर गुजरता है। इस क्षेत्र में जैश का दबदबा है। ऐसे में कट्टरपंथी देश पाकिस्तान के आतंकी संगठन के खिलाफ जाने का वह कदम नहीं उठा सकता है। दूसरी तरफ भारत के अमेरिका, जापान और वियतनाम से बढ़ता संबंध में उसे नागावार गुजरता है। वह एशिया में अपना दबदबा कायम करना चाहता है और उसके इस राह में भारत ही मुख्य रोडा है। अब भारत सरकार को अपनी कूटनीतिक जंग लड़ने के लिए छोड़ कर यहां के आवाम को चीन के खिलाफ आर्थिक जंग का ऐलान करना होगा और उसके सामानों का वहिष्कार कर उसे यह एहसास कराना होगा कि उसके लिए पाकिस्तान से ज्याद अहमीयत भारत की है। 
संजय त्रिपाठी



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