खुल्लम - खुला : देशभक्ति की चांसनी Patriotic



                                        खुल्लम - खुला

पूरा देश राष्ट्रप्रेम, देशभक्त की लहर में हिचकोले खा रहा है। युवा से लेकर बुढ़ों तक के दिल में देशभक्ति उमड़ रही है। आज अंग्रेजों के समय से भी बड़ी मातृभूमि व देशभक्ति का ज्वारभट्टा दिख रहा है। बस कुछ समय की बात है, 23 मई के बाद पाकिस्तान और चीन को पता चल जायेगा कि इंडिया का 56 इंच का क्या कमाल है ? सबके दिलों में देशभक्ति उफान मार रहा है। इस समय तो सिर्फ देश और देशप्रेम की बातें करो, देशभक्तों के विषय में सोशल मीडिया पर लिखो, लोगों को बताओं कि वास्तविक में देश से प्रेम कौन करता है ? कौन देश को हिन्दू राष्ट्र बना सकता है ? कौन है जो पाकिस्तान को जवाब दे सकता है ? किसकी शासन में हिन्दूओं की रक्षा हो सकती है ? अगर ऐसे प्रश्नकर्ताओं के पक्ष में उत्तर दिये तो अच्छा, नही ंतो प्रश्नकर्ता और उसके अन्य साथी सोशल मीडिया पर मां - बहन पर उतारू हो जायेंगे। फिर आप देते रहो जवाब ! जो इज्जत देता है वह गाली देने लगेगा, जो नजर नहीं मिलाता सम्मान में वह ऐसा काॅमेंट लिखेगा कि या तो आप सोशल मीडिया से हट जाओंगे या उसे हटा दोगे। कुछ माह पूर्व पत्रकारिता जगत के एक हमारे वरिष्ठ साथी अपने फेसबुक पर एक पोस्ट किये उसपर एक अखबार के सह संपादक ने बेहद ही गरीमाहीन टिप्पणी कर काॅमेंट लिखा। पढ़ने से यह स्पष्ट हो गया कि यह विचारों की लड़ाई नहीं, बल्कि पार्टियों की लड़ाई में दोनों पत्रकार बंट गए है। हालांकि उनमें से एक बीजेपी तथा दूसरा कांग्रेस समर्थक थे। ऐसा ही आज कल अक्सर देखने को मिल रहा है। ऐसे में लोकतंत्र की हत्या की जा रही है। साम्प्रदायिक सौहार्य को बनाने में बहुत समय लगा है, लेकिन जिस तरह आज कल एक समुदाय को मोहरा बना कर युद्ध का उन्माद फैलाया जा रहा है, यह लोकतंत्र के लिए गहरा संकट बनता जा रहा। कुछ तो अगर उनके बीजेपी की जरा सा भी आलोचना कर दी तो बुरा -से - बुरा गाली लिखने से थोड़ा सा भी नहीं हिचकते। सज्जन को अंत में चुप ही होना पड़ता है या उसे भी नंग बन मैदान में उतरना पड़ता है। यह है देशभक्ति की चांसनी। अधिकांश इस समय इस चांसनी में रंग गये हैं जो नहीं रंगे है वे इधर - उधर भटक रहे थे। चुनाव के समय में इसंान के साथ माॅब लिंचिंग फिलहाल बंद है , लेकिन अब शब्दों की माॅब लिंचिंग जारी है। देशभक्ति या भक्ति की नशा होती है, लेकिन विचारों की भी तो अपनी नशा है। एक - दूसरे के विचार बहुत कम ही मेल खा पाते हैं। फिर भी दूसरे के विचारों को पसंद नहीं करना ही अंधभक्ति या देशभक्ति है यह परिभाषा गढना लोकतंत्र में सही नहीं है। सबके विचार स्वतंत्र है। कही ऐसा न हो कि पतलून की खोज में लगोटा भी चला जाये। राम - राम   



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