खुल्लम - खुला : बडे़ बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले With great disdain, we get out of your quilt




                                                                खुल्लम - खुला


‘‘ हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पै दम निकले,
बहुत निकले मेरे अरमाँ लेकिन फिर भी कम निकले।
निकलना खुल्द से आदम का सुनते आये थे लेकिन,
बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले। ’’

यही कारण है कि मिर्जा गालिब आज लोगों के दिलो - दिमाग में जिंदा हैं। क्या खूब सटीक बैठ रहा आज के हमारे मीडिया भाईयों पर। लगता है बाॅलीबुड और हाॅलीबुड कुछ दिन बाद मीडिया संस्थानों को अपने कब्जे में जकड़ लेंगे और इलेक्ट्राॅनिक वाले टीआरपी बढ़ाने तथा प्रींट वाले काॅपी बढ़ाने में लगे रहेंगे। धीरे - धीरे राजनीति में अनारकली, अम्रपाली की एंट्री ने आम जनता में चुनाव के दौरान सभाओं व रैली में जाने की उत्सुकता बढ़ा दी है। एक वह समय था जब लोग रोटी - गुड़ बांध कर नेताओं को सुनने कोसों दूर जाते थे। 1982 में स्कूल बंक मार हम भी अपने साथियों के साथ साबाया फिल्ड में स्व0 इंदिरा गांधी को सुनने गए थे। हंसाने, गुदगुदाने और रात की निंद भगाने के माहिर स्व0 अटल बिहारी वाजपेयी को सुनने भी कई बार काम छोड़ कर गये। लेकिन अब समय बदल गया। अब नेताओं को सुनने के लिए भीड़ जुटानी पड़ती है। यातायात के साधन, खाना, पौव्वा और दिहाडी तक देने के बाद भी कुर्सियां खाली मिलती है। कई जगह देखने को मिल रहा है कि कुर्सी पर पानी का बोतल और खाने का पैकेट रखा है, लेकिन कुर्सी खाली है। अब जिस तरह बाॅलीबुड वालों में राजनीति में आने का भगदड़ मचा है वह पार्टियों को बैतरणी पार ही करायेगा, उसके नेताओं को भी साथ ही पूछ पकड़ा कर पार करा देगा।  जब से खाकी निक्कर, अनारकली और अम्रपाली पर लोगों की नजरें पड़ने लगी है, तब से सच कहूं एक बार फिर सभाओं में भीड़ खींचने लगी है। सबसे बड़ा संकट तो अब मीडिया के सामने आ रहा है। एक अभीनेता जब दूसरे अभीनेता का इंटरव्यू लेने लगेगा तब हमारे साथी जो दिनभर गाल बजायी में लगे रहते हैं, वे क्या करेंगे। नोएडा फिल्म सिटी में एक बार करीब डेढ़ साल पूर्व साथियों के द्वारा बाते चल रही थी कि करीब 32 चैनल एक उधोगपति ने खरीद लिया है । उनके नाम अलग - अलग, पत्रकार अलग - अलग लेकिन कार्य सबका एक ही है। आज जिस भी न्यूज चैनल को हम बदल रहे हैं, सबका लबोलुआब एक ही है। इसी तरह इंटरव्यू के लिए अब अभिनेताओं को आगे लाया जा रहा, क्योंकि सब अपना - अपना कार्य छोड़ दूसरे में टांग अड़ाने में लगे है। चुनाव के दौरान चोर, चोरी छोड़ प्रत्याशी के लिए सभा की व्यवस्था में व्यस्थ है। नेता अभिनेता बन कर लोगों को अपने तरफ खींच रहा है। छुटभैया नेता सोशल मीडिया पर विरोधियों को गाली दे रहा और अभिनेता अब नेता बन कर घूम रहा। अभिनेता, अनारकली, अम्रपाली, के बाद खिलाड़ी, खली, बली भी पीछे नहीं है। सब ‘तू चल मैं आई’ के पीछे लगे है। पत्रकार भाई समझ तो रहे हैं, लेकिन क्या करें। उनकी स्थिति तो ‘जिंदगी की उदास रातों में बेवफा तेरी याद आती है’ जैसी बन गई है। एक तो गुमनामी के तरफ बढ़ रहे हैं, वे भी कभी बहुत इंटरव्यू लेते थे। एक इस इंटरव्यू को प्रोजेक्टेड और पेड न्यूज की संज्ञा दे रहे है। खैर, सचाई जो हो लेकिन आबरू का ख्याल तो करना ही पड़ेगा। 
संजय त्रिपाठी   


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