खुल्लम - खुला : माया, ममता और वो Khullam - khula





                                                                     खुल्लम - खुला

 ‘ माया महा ठगनी हम जानी ’ कबीर की यह वाणी आज भी लोगों को गुनगुनाते सुनते हैं तब लगता है कि कई सौ वर्ष पहले कही गई कबीर की यह वाणी आज भी कितना सार्थक है। खासतौर से आज कल इस वाणी का उच्चारण प्रवचन, सत्संग के दौरान महात्माओं द्वारा किया जाता है। महात्मा लोग कहते हैं कि सबसे बड़ा नर्क का द्वार माया है जो भी इसके फेरे में फंस गया उसे मोक्ष नहीं मिल पाता। अपने को माया से दूर करो और यह माया मुझे दे दो। कई भक्तों ने अपने गुरू जी के कथन पर विचार करते हुए खुद सड़क पर आ गए और गुरूजी को सेठ बना गये। अपने आस - पास ऐसा देख कर लगता है कि माया सही में ही महा ठगनी है, इसके फेरे में पड़ कर ठगा ही जाता है। इसी तरह माया के साथ ममता को भी दूर रखने के लिए महात्माओं का संदेश दिया जाता है। एक प्रवचन के दौरान एक भक्त ने महात्मा जी से पूछ ही लिया जब माया, ममता, काम, क्रोध और ईष्र्या इन पांच को त्याग ही देंगे तब इस जीवन की क्या उपयोगिता रह जायेगी। फिर तो हम सब भी आपके श्रेणी में आ जायेंगे, तब आपका यह प्रवचन सुनेगा कौन? महात्मा जी भक्त के इस प्रश्न पर बौखल्ला गए और कई तरह के तर्क से उसे समझाने लगे। गुरू जी व महात्मा लोगों के बार - बार कहने के बाद भी इंसान इन पांचों को अपने से अलग नहीं कर पाता है। कुछ तर्क शास्त्रियों का कहना है कि इन पांचों को त्यागा तो नहीं जा सकता, लेकिन इनसे लगाव कम किया जा सकता है। युगों से लोग महात्माओं के बातों को नहीं समझा, उसे अपने जीवन में नहीं अपनाया, लेकिन एक वो है जिसने बिना प्रवचन दिये ही आम लोगों से माया और ममता से दूरी बना दी। एक तरफ जहां ऊत्तर प्रदेश के लोगों ने 2014 में ही माया से दूरी बनानी शुरू कर दी, तो दूसरी तरफ ममता से दूरी भी इस बार साफ दिखाई दे रहा है। वो महात्माओं के तरह साफ कहता है कि भक्तों माया और ममता को त्यागो और इसे मुझे दे दो। अगर यह दोनों तुम्हारे साथ रहेंगी तब तक तुम्हारा विकास नहीं हो पायेगा। यकीन न हो तो देखो 70 साल बाद भी न तुम्हार विकास हुआ और न देश का ही विकास हुआ। नतीजा बंगाल में आपके सामने है। अब लोग माया ओर ममता को त्याग कर प्रभु के शरण में जा रहे है। धीरे - धीरे उनके अंदर से काम, क्रोध और ईष्र्या भी समाप्त हो जायेगा। कुछ भक्तों को तो पता है कि जीवन का वास्तविक आनंद प्रभु के शरण में ही है और यह तभी प्राप्त हो सकता है जब माया और ममता के साथ काम, क्रोध ओर ईष्र्या के चंगुल से भी इंसान मुक्त हो जाएगा। सभी भक्त अभी से ही सोशल मीडिया रूपी भटकाव शास्त्र से लोगों को प्रवचन वाणी पिलाना शुरू कर दिए है। कई बार तो ऐसे तर्को को देखकर मैं भी हैरान हो जाता हूं, जो किसी भी शास्त्र या इतिहास में कही भी वर्णित नहीं है वह भटकाव शास्त्र में मिल जा रहा है। इससे ज्ञान चक्षु खुल रहा है। अगले पांच साल में सबसे ज्यादा लोगों का ज्ञान चक्षु खुल जायेगा और भक्तों को स्वर्ग की प्राप्ति हो जायेगी। चलो अब मैं भी इनसे मुक्ति का प्रयास करता हूं। 

संजय त्रिपाठी  





                          



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